Thursday, November 25, 2010

उजड़ने लगी है महफ़िल , बिखरने लगा है समां ...
अभी तो शाम बाकी है !!!

रुको दोस्त , कहाँ  जाते हों ?
अभी तो मेरे जनाजे का जाम बाकी है !!!

लफ्जे-गुफ्तगू ने पैवस्त किया है खंजर ,
अभी तो मरने का अंजाम बाकी है !!!

Tuesday, November 23, 2010

जामे-गम में शरीक ना होने दिया हमे...
और वो हमसे दोस्ती का दावा करते हैं !!!

Tuesday, November 16, 2010

उनसे बीछडने का रश्क क्या करे ,
शाम ढले तो साया भी साथ नहीं देता ...


ख्वाबों में उनका अब ,तस्सवुर नहीं ,
बस जागने की तम्मना रखते है ...
चलो आज मैखाने ,
शाम ढली है...
दिल के अरमाँ ,
सरेआम जली है |

अरमानों के बावस्ता ,
ना पूछ मेरे दोस्त -
दिल के कोने में ,
एक आग लगी है |

चलो आज मैखाने ,
शाम ढली है ...

Saturday, November 13, 2010

बंद गलिओं के ऊंचे छत को देखता मैं ,
अचानक ठिठक कर , रुक जाता हूँ |

जाने वो मकाँ अपना सा लगा ,
जिसके दरवाजे पर बरसों से ताला लगा है !!!

Friday, November 12, 2010

लफ्जों की जुम्बिश ने ना कहीं जो बातें ,
दिल के थमने से वो बात जाहिर हुई |

अरमाने इज़हार जज्ज्ब करता रहा मै ,
पर , दिल के आसुओं ने फ़साना लिख दिया |
आज एक हरा पत्ता क्यूँ टुटा है ?

क्या हक ना था उसे ,
उस डाल से लिपटे रहने का !!!
जिससे उसने जन्म लिया था ... !!!

हवा के थपेड़ो ने क्यूँ ,
बाध्य किया उस डाली को ???
 और भी तो पत्ते थे ,
जो पा चुके थे लाली को !!!

 लगता है की-
 इसबार बसंत उससे रूठा है ...

आज एक हरा पत्ता क्यूँ टुटा है ?
उस कटी पतंग को मै ,
जाने क्यों देखता रह गया !!!

शायद मेरी उससे बातें हुई हों,
दर्दे-गम की मुलाकाते हो हों,

खूब उड़ा वो भी ,
बादलों की रवानियों में .

पर अब कट कर ,
गिरा है , कहीं वीरानीओं में !!!

काटने की कसक ना है ,
उसके दिल को , पर ...

कोई भी ना आया उसे ,
उस , ऊंची पेड़ से उतारने !!!